वो 6 महीने बाद घर लौट रहा था। ये पहली बार था की वो घर से इतने लम्बे समय के लिए बाहर था। आँखों में एक अनजानी सी ख़ुशी थी, अपने घर वालो को देखने की, अपने दोस्तों से मिलने की, अपने शहर को देखने की। दिल्ली की भाग दौड़ ने मानो उसको इन सब खुशिओ से मानो कुछ दूर सा कर दिया था। जैसे जैसे ट्रेन उसके शहर के पास पहुच रही थी उसके चेहरे पे एक चमक आती जा रही थी। रोज माँ से बात तो करता था पर बहुत दिन हो गए थे माँ की गोद में सर रख के सोए हुए, माँ की डांट सुने हुए, माँ से बहस किए हुए और माँ के हाथ का खाना खाए हुए। जैसे ही ट्रेन प्लेटफार्म पे घुसी मानो उसको ख़ुशी एक अलग ही एहसास हुआ। सामन उठा के प्लेटफार्म पे उतरा ही था की सामने माँ दिख गई। माँ के पैर छुए ही थे की माँ ने उसे कस के गले लगा लिया।
गीली आँख लिए नम आवाज में माँ ने कहा - कितना दुबला हो गया है ,कुछ खाता नही था क्या।
माँ मैंने आपको मना किया था ना स्टेशन आने के लिए , क्यूँ तकलीफ की आपने,मै आ जाता अपने आप घर। अरे अपने बच्चों के लिए कोई तकलीफ होती है क्या, माँ ने उसका सूटकेस उठाते हुए कहा। और ये बैग इतना हलका क्यूँ है, तू सारे कपडे नहीं लाया क्या, ले आता तो मै सही से सब धो देती। अरे माँ मै अब सब सीख गया हूँ, उसने अपने सूटकेस माँ के हाथ से वापस लेते हुए कहा। अच्छा ६ महीने में तू सब सीख गया, माँ को बेवकूफ बनाना भी - माँ ने उसको डांटते हुए बोला।
रात काफी हो गई थी और सफ़र की थकान भी थी तो घर आके बिना खाने खाए ही सो गया। आखिर बड़े दिनों बाद घर का सुकून नसीब हुआ था। शायद ख़ुशी से ही पेट भर गया था।
सुबह के 9 बजे तो माँ ने सोचा उसको अब नींद से उठा दिया जाए। कमरे में गई तो दंग रह गई। वो नींद से पहले ही जाग चुका था, बिस्तर पूरा सही कर के बाथरूम में नहाने जा चुका था।
नहा के आया तो माँ सीधे पूछ बैठी - " तू कबसे इतनी जल्दी उठने लग गया, और ये बिस्तर सही करना कब सीख गया"
अरे माँ हॉस्टल में सुबह नहाने के लिए लाइन लगती है , तो देर से उठो तो नहाने का समय नहीं मिलता और रही बात कमरा सही करने की तो वो तो मै तुझे देख देख के ही सीख गया था - उसने मुस्कुराते हुए और माँ को छेड़ते हुए बोला।
माँ को पहली बार लगा उसका लड़का वाकई में बड़ा हो गया। बड़े दिनों बाद उसने पेट भर के खाना खाया, माँ ने भी उसको खिलाने में कोई कसर नहीं छोडी। नाश्ता कर के उठा ही था की माँ बोली - अच्छा आज शाम को घर पे ही रह,ना तेरे लिए एक सरप्राइज है। लेकिन माँ शाम को मुझे दोस्तों से मिलने जाना है, उसने माँ को टालते हुए बोला।
नहीं मैं नहीं जानती कुछ, दोस्तों से कल मिल लेना। आज शाम को तुझे घर पे ही रहना है - माँ ने गुस्सा दिखाते हुए बोला। माँ का गुस्सा देख उसे माँ की बात माननी ही पड़ी। अच्छा ठीक है माँ लेकिन ये तो बता दे की सरप्राइज क्या है। वो तो शाम को ही पता चलेगा, माँ खुश होते हुए अपने कमरे में चली गई।
दिन का समय जैसे तैसे इन्टरनेट और दोस्तों से मोबाइल पे बात करते करते निकल गया। शाम होते होते उसके दिमाग से सरप्राइज वाली बात निकल ही गई थी जब माँ उसके कमरे में आई और बोली - चल आ तेरे सरप्राइज का वक़्त हो गया।
अरे माँ अब बता भी दे क्यूँ गोल गोल पहेलियाँ बुझा रही है। अरे चल तो मेरे साथ, बस अभी बताती - माँ उसका हाथ पकड़ के उसे डाइनिंग रूम की तरफ ले गई। एक कुर्सी पे उसे बिठाते हुए बोली - अब जब तक मैं ना बोलू तू अपनी आँखे बंद रखना। अच्छा माँ लेकिन जल्दी करो, क्या बच्चो की तरह कर रही हो। उसको अब उलझन हो रही थी इस सरप्राइज वाली बात से।
करीब आधे मिनट बाद माँ की आवाज आई - अब आँखे खोल.
आँखे खोली तो देखा माँ सफ़ेद एप्रन पहने हाथ में एक ट्रे लिए खड़ी थी।
ये सब क्या है माँ, और ये हाथ में क्या है? उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
तो माँ बोली - "Presenting to you,
the special chicken lasagne pizza”.
उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। वो सारा वक़्त जब उसने माँ के अंग्रेजी बोलने का मजाक बनाया था एक पल में उसकी आँखों के सामने से निकल गया। अक्सर वो माँ के खाने को ये कह कर मना कर दिया करता था की मुझे कुछ बाहर का बना के खिलाया करो। वो एक टकटकी लगे माँ को देखता रहा।
अरे ऐसे क्या देख रहा है - तू नहीं था तो मेरे पास करने को कुछ नही रहता था - तो मैंने इंग्लिश स्पीकिंग क्लासेज में एडमिशन ले लिया, तू हमेशा बोलता था ना की मैं सही इंग्लिश नही बोल पाती। फिर भी समय नहीं कटता था तो फिर मैंने कुकिंग क्लासेज भी ज्वाइन कर ली। तुझे बाहर का खाना जयादा पसंद था ना। अब मैं तुझे सब घर पे बना के खिलाया करुँगी।
उसकी आवाज को मानो शब्दों की कमी हो गई थी, उसकी आँखें आंसुओं से भर उठी थी, वो पिज़्ज़ा खाते हुए माँ से बोला - मुझसे तू हिंदी में ही बात किया कर - और मुझे तेरे हाथ का दाल चावल खाना है , हॉस्टल में एकदम बेकार खाना मिलता है।
वो मैं रात को बना दूंगी, मगर ये तो बता पिज़्ज़ा बना कैसा है- नहीं अच्छा बना तो मैं कुछ और बना देती हूँ - माँ बोली
वो धीरे से बोला - बहुत अच्छा बना है माँ ।
वो इस समय बस माँ से लिपट के फूट फूट के रोना चाहता था !!
